हर सुबह खबरों से भरा हुआ अखबार हमारे दरवाजे पर आ धमकता है। हम अखबारों को खोलते हैं, देश दुनिया की हालात को समझते हैं और फिर मोड़कर उसे पुराने अखबारों के ढेर में पहुंचा देते हैं। 30 मई के दिन को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 1826 में इसी तारीख को हिंदी भाषा में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के नाम से पहला समाचार पत्र निकाला गया था।

गुप्त काल में ऐतिहासिक प्रसंग, धर्म प्रदेशों, राजाज्ञा आदि के लोग संप्रेषण माध्यम के रूप में शिलालेखों का प्रयोग किया जाने लगा था इस जनसंचार माध्यम की महत्ता का दशपुर राज्य के रेशमी वस्त्र निर्माताओं व्यापारियों ने भली-भांति पहचाना और बड़ी कुशलता के साथ अपना व्यापार बढ़ाने के लिए उसका प्रयोग भी किया।गुप्तकालीन अभिलेखों में इसवी सन 436 – 455 में दशपुर राज्य के अधिपति बंधु वर्मन (बंधु वर्मा) के यशस्वी शासनकाल में सूर्य मंदिर के निर्माण का विवरण है यह दशपुर राज्य की सर्वतो मुखी समृद्धि का युग था दक्षिण गुजरात से रेशमी वस्त्रों के बुनकर व्यापारी दशपुर राज्य में आकर बसे और फले फूले। उन्होंने अपना एक संघ भी बना लिया था। इसी संघ ने दशपुर मंदसौर नगर में इसवी सन 437 – 38 में विशाल सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। बीच के उत्तल पुथल भरे काल में मंदिर को क्षति पहुंची तब उसी संघ ने इसलिए सन 473 – 474 में मंदिर का पुनरुद्धार कराया। तभी मंदिर में शिलालेख उत्कीर्ण कराया गया। इस शिलालेख पर बर्ड्स भट्टी रचित पद रचना उत्कीर्ण है जो संस्कृत भाषा में है समय के थपेड़ों ने शिलालेख पर प्रभाव तो डाला है लेकिन वह अभी भी स्पष्टत: पढ़ें और समझे जाने की स्थिति में है। मूलतः यह पद्य रचना सूर्य पास ना और सम्राट की अभ्यर्थना को समर्पित है लेकिन बीच की पंक्तियां 11 एवं 12 में बड़ी कुशलता के साथ संघ के व्यापारिक हितों की पूर्ति के उद्देश्य से रेशमी वस्त्रों की लोकप्रियता को बढ़ाने वाला विज्ञापन संदेश समाहित किया गया है विज्ञापन संदेश इस प्रकार है-“तारुण्य कान्यू पचितौ सुवर्णा हारतांबूल पुष्प विधि ना संभल को पि। नारी जन: प्रिय भूपैति न तावदस्यायावन्न पट्टमय वस्त्र यूगानी निधत्ते।।”

रेशमी वस्त्रों का यह विज्ञापन दशपुर (मंदसौर) के सूर्य्य मंदिर मैं शिलालेख पर इसवी सन 473-74 में उत्कीर्ण्ण कि गया।
अर्थात् भले ही योवन कांति कितनी भी हो या कितनी ही पुष्प सज्जा और आभूषण धारण किए हो तांबूल से होठ रच लिए हो लेकिन नारी तब तक अपने प्रिय के पास नहीं जाती जब तक उसने रेशमी वस्त्र धारण नहीं कर लिए हो।इस प्रकार पहले पहल मध्यप्रदेश ने ही दुनिया को विज्ञापन कला का ज्ञान दिया और व्यापार व्यवसाय में यह नया आयाम जोड़ा वर्तमान विज्ञापन अवधारणा से पड़ताल करें तो इसके जो विविध पक्ष सामने आते हैं वह शिलालेख निर्माताओं के सोच की मौलिकता की पुष्टि करते हैं प्रथम तो विज्ञापन संदेश के अंकन के लिए स्थल का चुनाव,जो तत्कालीन परिस्थितियों में सचल जनसंचार माध्यमों की अनुपस्थिति में मंदिर से बेहतर हो ही नहीं सकता था क्योंकि जनसामान्य की पहुंच का सर्व सुलभ सार्वजनिक स्थल होता है मंदिर। दूसरे सूर्योपासना और राजा की अभ्यर्थना की पठनीयत्ता के बीच विज्ञापन संदेश का समाहित होना उसका पड़ा जाना सुनिश्चित करता था तीसरे विज्ञापन संदेश पढ़ने वाला चाहे प्रिय रहा हो या प्रिया उसके अलंकार से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता होगा विज्ञापन संदेश की सफलता का यही तो पैमाना होता है।

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